सड़कके किनारे…

मई की भरी दोपहर में,
जब चलता हु उन तपती मैली सड़कोपर,
मनमे ख़याल आता है,
कई हस्तियाँ चली होंगी, उम्र से लम्बी इन सड़कोपर..

कई सपने चूर होक बिखरे होंगे,
इसकी धुंदलीसी गलियोंके हर मोड़ पर,
किसीने उम्मिदकी किरणका हात थामे,
यहिंसे मंझिलकी ओर कदम बढाया होगा.

किसी मजनूने हसी राज बांटे होगे,
इसी नुक्कड़पे अपने दोस्तोंसे,
तो कही दूर, सड़कके किनारे, धुल महकी होगी,
टपके हुए टूटे दिलके आंसूओंसे.

इन्ही गुजरी जिंदगियोंको छूता हुवा,
मै चल रहा हु, मई की भरी दोपहर में,
अपनी मंझिलकी ओर,
मेरे ज़िन्दगीके चंद लम्हें छोडकर इसी सड़कके किनारे…


Here’s recording of my recitation for you guys… Hope you all will enjoy…

 


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2 Comments

  1. अद्भुत! मेरे पास शब्द कम पड़ गये हैं ये बताने के लिए कि कितनी खुश हूँ. मैं अक्सर हिंदी में कविताएँ लिखती हूँ और कभी सोचा ही नहीं कि अपने ब्लॉग पर भी हिंदी में ही लिखूं. काफ़ी लोग ऐसा ही सोचते हैं और फिर वही कहते हैं कि हिंदी के पाठक नहीं हैं. तुम्हारी ये कविता सुंदर ही नहीं प्रेरणामयी भी है. बस थोड़ी बहुत अशुद्ध वर्तनियाँ हैं. 😝 Autocorrect!!
    कुछ 3-4 दिन पहले ही मैंने भी दिल्ली के गड्ढों को एक कविता समर्पित की है. 😁
    और ये audio recording का विचार तो भई मैं चोरी करने वाली हूँ. इसी तरह कविता पाठ की झिझक भी निकल जाएगी.
    अद्भुत!

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