No, It’s not a creative block

Hello friends,

I am really sorry to keep you all waiting. I know, I have missed my last two posts. No, it’s not a creative block that’s holding me up. She is kind of preoccupied with some cool stuff happening at my office, which soon will be revealed to you.

In the second half of October, I took #TheMindfulBreak with all the lovely people who gathered around on Modern Gypsy’s call. Here you can enjoy all those moments at one place.

Getting ready for #sundaymood is my #TheMindfulBreak for the day… #blue

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#farmfresh groundnuts at my friend’s farm. #CoffeeCatClicks #TheMindfulBreak #instafood

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I am really happy to be part of our li’l Mindful Break Community. I returned from this break on 1st of November and since then it has been a busy time at work. But no day is hell busy for a bibliophile. I am currently enjoying ‘The Devil is a Black Dog – Stories of War and Revolution from the Middle East and Beyond‘. I received this book in a subscription box of Kaffeinated Konversations. I will definitely tell you more about this in my next post as I will be finishing it soon.

There’s also a good news guys, I am very happy about the love you showed to my Instagram handle. Today I am celebrating 500 followers. Thank you all. Keep showering those little ❤️.

Hope to see you soon guys. Stay tuned.

Until the next time…

Bbye…

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डावास नांव इश्क

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डावास नांव इश्क, जो रंगात येत आहे,
जीवास माझिया मी, दाव्यास लावताहे.

ही खातरी मलाही, हरणार मीच आहे,
रुपास त्या भुलूनी, फासे फितूर आहे,

नजरेसमोर अजुनी, थोडे तिने असावे,
म्हणून खेळतो मी, जरी हारलोच आहे.

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बुढ़ापा

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Photo by Saad Ahmed

हर रोज़ सुबह जब मैं मेरे कमरेकी खिड़की खोलता हूँ,
तो यही एक सवाल हमेशा होता है।
के ये कौन है जो एक आंखसे हमेशा मुझको तांकते है।
जिनका कश्मीरी गोरा रंग अब इन झुरनियोसे सजा हुआ है,
एक अजिबसा wisdom झलकता है उस चेहरेपे।
ये एक आँख बंद क्यों है और…
और दूसरी उनींदी, मानो कबसे सोयेही न हो।
शायद बुढ़ापा अब सोनेभी नही देता होगा।
एक अरसा वो भी हुआ होगा,
जब इन्ही दो आँखोने न जाने क्या क्या दुनिया देखी होगी।
भरापूरा परिवार देखा होगा, खिला हुवा घर देखा होगा।
वो चूल्हा देखा होगा, जहा मेहनतसे कमाई हुई रोटी पकती होगी।
आँखोंमें ढेर सारा प्यार लेके उस चौखटपर खड़ी नवेली दुल्हन को देख होगा।
उनके गृहस्थीके वसन्त, वर्ष और कभी कभी झुलसाते ग्रीष्म भी देखे होंगे।
अपनी जगह से बड़ी संतुष्टिसे देखा होगा, जब नन्हे कदमोंसे खुशियाँ आयी थी।
उन नन्हे कदमोंको अपने आंखोंके सामने बड़ा होतेभी देखा होंगा।
पर तब ये आंखे कहा जानती थी के जो कदम बड़े हो रहे है,
वो एक दिन बाहरकी और दौड़ेंगे, वापस न लौटनेके लिए।
शायद, हा शायद तबसेही, ये एक आंख बंद है, और एक उनींदी….


I had written this poem for a prompt of the week of Baithak and beyond. But uncertain weather got better of us and the session got postponed. So here’s the poem for you guys…

Have fun. Stay blessed…

 

 

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सड़कके किनारे…

मई की भरी दोपहर में,
जब चलता हु उन तपती मैली सड़कोपर,
मनमे ख़याल आता है,
कई हस्तियाँ चली होंगी, उम्र से लम्बी इन सड़कोपर..

कई सपने चूर होक बिखरे होंगे,
इसकी धुंदलीसी गलियोंके हर मोड़ पर,
किसीने उम्मिदकी किरणका हात थामे,
यहिंसे मंझिलकी ओर कदम बढाया होगा.

किसी मजनूने हसी राज बांटे होगे,
इसी नुक्कड़पे अपने दोस्तोंसे,
तो कही दूर, सड़कके किनारे, धुल महकी होगी,
टपके हुए टूटे दिलके आंसूओंसे.

इन्ही गुजरी जिंदगियोंको छूता हुवा,
मै चल रहा हु, मई की भरी दोपहर में,
अपनी मंझिलकी ओर,
मेरे ज़िन्दगीके चंद लम्हें छोडकर इसी सड़कके किनारे…


Here’s recording of my recitation for you guys… Hope you all will enjoy…

 


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भरू बांगड्या सयांनो

आला श्रावण संख्यांनो,
चला जाऊ बाजाराला,
साज शृंगार करूया,
मास सणांचा हा आला.

भरू बांगड्या सयांनो,
गर्द हिरव्या रंगात,
सौभाग्याचे हे लक्षण,
किणकिणते हातात.

बांधू कंकण मोतीये,
मन खुलेलं क्षणात.
वाटे आकाश चांदणे,
मी बांधले हातात.

या बांगड्या लाखेच्या,
मज घेऊ वाटतात,
फुलतील इंद्रज्योती,
तिच्या साऱ्या आरश्यांत.

काय काय भरू हाती
नाही ठरत मनात,
का होते माझे ऐसे,
दरवेळी श्रावणात?


Thank you Anupriya for such a wonderful suggestion of posting audio of my recitation, and see fortunately Saad Ahmed from “बैठक and beyond” has captured this recitation from our yesterday’s session at “Matoshree Ramabai Ambedkar Udyan, Pune” where I have explained a bit about the poem in Hindi too. Thank you, Saad.


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मुख़्तसरसी बात है…

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मुख़्तसरसी बात है,
तू जो सूनले तो मैं केह दु।

तेरी होठोंकी लालिसे,
और आँखोंकी गहराईपे,
ना कोई नझ्म लिख दु,
मुख़्तसरसी बात है…

चंद लम्होकी मुलाक़ाते,
बाकी बेचैन तनहाईकी
कोई गझल ना केह दु.
मुख़्तसरसी बात है…

तेरे आतेही बढ़ी धडकने
और सांस रुक गयी तो,
उसे रुबाई न बना दु,
मुख़्तसरसी बात है…

घुमाकर न अब करते हैं बात,
इश्क़का इजहार अब,
तू जो कहदे तो मै कर दू।
मुख़्तसरसी बात है,
तू जो सूनले तो मैं केह दु।


#LatePost Sorry guys, I missed the Monday post. Uploading this today.

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