A negative neon

We have started looking ourselves in a negative neon. We define us in terms of “We aren’t like this” or “We don’t do that”. But we can be inclusive in defining ourselves. How? read here...

पुढला पाऊस

आज आपल्यासमोर एक वेगळा विरह मांडतो आहे. आयुष्याच्या शेवटल्या टप्प्यावरचा. तुम्हाला ही कविता नक्की आवडेल. Here's a poem about the longing of his love at old age with an uncertainty of chance to enjoy the next monsoon.

सड़कके किनारे…

मई की भरी दोपहर में, जब चलता हु उन तपती मैली सड़कोपर, मनमे ख़याल आता है, कई हस्तियाँ चली होंगी, उम्र से लम्बी इन सड़कोपर.. कई सपने चूर होक बिखरे होंगे, इसकी धुंदलीसी गलियोंके हर मोड़ पर, किसीने उम्मिदकी किरणका हात थामे, यहिंसे मंझिलकी ओर कदम बढाया होगा. किसी मजनूने हसी राज बांटे होगे, इसी... Continue Reading →

आस

लागली ग आज पहा, धार पाऊस संतत, तुला जमेना यायला, हीच मनी आहे खंत... [ Read more on https://adisjournal.com/aas/ ]

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