बारीश और तुम #१

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हर पल जब असमान से कुछ बुंदे मेरे उपर गिरती है,
दिल के किसीं कोनेसे तुम्हारी आवाज आती है।

मेरा गिला बदन तुम्हारी यादोसे मेहेकता है,
मानो महिनोसे झुलसे हुए मिट्टीपे पेहेली बारिश गिरी है।

कभी बिजली कडकती है, और मै भी थोडा कांपता हू,
मेहसूस करता हू, जैसे तुम कांपके मुझसे पिहली बरसात मे लिपटी थी।

तुम्हारा गीला बदन, अभिभी मुझपे ओढे इस खिडकी मे खडा हू,
रसोईसे आती गर्म कॉफी की खुशबू आज भी तुम्हारेही पसंदकी है।

खुले खिडकिसे कोई बुंदे जब मुझ पे आंके गिरती है,
तो दिल की किसीं गेहराईसे तुम्हारी आवाज आती है।

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