बारीश और तुम #३

धुँवाधार बारिश है ये, थमने का कुछ नाम नही, पहाडोसे बिछड़नेपर, शायद फुटके रो रही। हम तुम भी तो बिछड़े है, महीनोसे ना मिल पाए, इन बरसते बादलसीही, क्या तुमभी बेहाल हो? जब हवा बादल उड़ा लाई, तबसे ये है जान गए, मुलाकात अब पहाड़की, अगले साल ही नसीब है। ये कंबख्त नौकरी जब, दूरी हममें डालती है, आहे…

बारीश और तुम #२

कल रातकी बारिश कुछ बूंदे छोड गयी है, वहा खिडकीकी चौखटपर , मेरी कलाई की घडी मे फसी तुम्हारे कुर्तेके कुछ रेशमी धागों जैसी। मेरे कंधेपे सर रखकर अपनी उँगलिसे मेरे सिनेपे तुमने जो लिखे थे, वो अल्फाज अपने नाजुक हाथोंमें समेटे, देखो वो पल घूम रहे है मेरे इर्दगिर्द। जालीम हवा झोका कुछ बुंदोंको…

बारीश और तुम #१

A post shared by aditya (@adisjournal) on Jun 20, 2017 at 2:21am PDT हर पल जब असमान से कुछ बुंदे मेरे उपर गिरती है, दिल के किसीं कोनेसे तुम्हारी आवाज आती है। मेरा गिला बदन तुम्हारी यादोसे मेहेकता है, मानो महिनोसे झुलसे हुए मिट्टीपे पेहेली बारिश गिरी है। कभी बिजली कडकती है, और मै भी…