सडके

मईकी भरी दोपहर में
जब चलता हूं उन तपती, मैली सड़कोंपर
मनमें ख़याल आता है
कई हस्तियाँ चली होगी उम्र से लम्बी इन सड़कोंपर|

कई सपने चूर होंके बिखरे होंगे
इसकी धुंधलीसी गलियोंके हर मोड़ पर,
किसीने उम्मीदकी किरणका हाथ थामे
यहीसे मंज़िलकी और कदम बढ़ाया था|

किसी मजनूने हसीं राज बांटे होंगे
इसी नुक्कड़पे अपने दोस्तोंसे
तो कही दूर सड़कके किनारे धुल मेहेकी होगी
टपके हुए टूटे दिलके आंसुओसे|

इन्ही गुजरी जिंदगियोंके लम्होंको छुता मै चल रहा हूं,
मईकी भरी दोपहर में,
अपनी मंज़िलकी और,
मेरी ज़िन्दगीके चंद लम्हे छोड़कर इस सड़कके किनारे…|

 

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This journal entry comes as part of “Blogchatter prompt”.. Down the memory lane

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