डावास नांव इश्क

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डावास नांव इश्क, जो रंगात येत आहे,
जीवास माझिया मी, दाव्यास लावताहे.

ही खातरी मलाही, हरणार मीच आहे,
रुपास त्या भुलूनी, फासे फितूर आहे,

नजरेसमोर अजुनी, थोडे तिने असावे,
म्हणून खेळतो मी, जरी हारलोच आहे.

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बुढ़ापा

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Photo by Saad Ahmed

हर रोज़ सुबह जब मैं मेरे कमरेकी खिड़की खोलता हूँ,
तो यही एक सवाल हमेशा होता है।
के ये कौन है जो एक आंखसे हमेशा मुझको तांकते है।
जिनका कश्मीरी गोरा रंग अब इन झुरनियोसे सजा हुआ है,
एक अजिबसा wisdom झलकता है उस चेहरेपे।
ये एक आँख बंद क्यों है और…
और दूसरी उनींदी, मानो कबसे सोयेही न हो।
शायद बुढ़ापा अब सोनेभी नही देता होगा।
एक अरसा वो भी हुआ होगा,
जब इन्ही दो आँखोने न जाने क्या क्या दुनिया देखी होगी।
भरापूरा परिवार देखा होगा, खिला हुवा घर देखा होगा।
वो चूल्हा देखा होगा, जहा मेहनतसे कमाई हुई रोटी पकती होगी।
आँखोंमें ढेर सारा प्यार लेके उस चौखटपर खड़ी नवेली दुल्हन को देख होगा।
उनके गृहस्थीके वसन्त, वर्ष और कभी कभी झुलसाते ग्रीष्म भी देखे होंगे।
अपनी जगह से बड़ी संतुष्टिसे देखा होगा, जब नन्हे कदमोंसे खुशियाँ आयी थी।
उन नन्हे कदमोंको अपने आंखोंके सामने बड़ा होतेभी देखा होंगा।
पर तब ये आंखे कहा जानती थी के जो कदम बड़े हो रहे है,
वो एक दिन बाहरकी और दौड़ेंगे, वापस न लौटनेके लिए।
शायद, हा शायद तबसेही, ये एक आंख बंद है, और एक उनींदी….


I had written this poem for a prompt of the week of Baithak and beyond. But uncertain weather got better of us and the session got postponed. So here’s the poem for you guys…

Have fun. Stay blessed…

 

 

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सड़कके किनारे…

मई की भरी दोपहर में,
जब चलता हु उन तपती मैली सड़कोपर,
मनमे ख़याल आता है,
कई हस्तियाँ चली होंगी, उम्र से लम्बी इन सड़कोपर..

कई सपने चूर होक बिखरे होंगे,
इसकी धुंदलीसी गलियोंके हर मोड़ पर,
किसीने उम्मिदकी किरणका हात थामे,
यहिंसे मंझिलकी ओर कदम बढाया होगा.

किसी मजनूने हसी राज बांटे होगे,
इसी नुक्कड़पे अपने दोस्तोंसे,
तो कही दूर, सड़कके किनारे, धुल महकी होगी,
टपके हुए टूटे दिलके आंसूओंसे.

इन्ही गुजरी जिंदगियोंको छूता हुवा,
मै चल रहा हु, मई की भरी दोपहर में,
अपनी मंझिलकी ओर,
मेरे ज़िन्दगीके चंद लम्हें छोडकर इसी सड़कके किनारे…


Here’s recording of my recitation for you guys… Hope you all will enjoy…

 


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भरू बांगड्या सयांनो

आला श्रावण संख्यांनो,
चला जाऊ बाजाराला,
साज शृंगार करूया,
मास सणांचा हा आला.

भरू बांगड्या सयांनो,
गर्द हिरव्या रंगात,
सौभाग्याचे हे लक्षण,
किणकिणते हातात.

बांधू कंकण मोतीये,
मन खुलेलं क्षणात.
वाटे आकाश चांदणे,
मी बांधले हातात.

या बांगड्या लाखेच्या,
मज घेऊ वाटतात,
फुलतील इंद्रज्योती,
तिच्या साऱ्या आरश्यांत.

काय काय भरू हाती
नाही ठरत मनात,
का होते माझे ऐसे,
दरवेळी श्रावणात?


Thank you Anupriya for such a wonderful suggestion of posting audio of my recitation, and see fortunately Saad Ahmed from “बैठक and beyond” has captured this recitation from our yesterday’s session at “Matoshree Ramabai Ambedkar Udyan, Pune” where I have explained a bit about the poem in Hindi too. Thank you, Saad.


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मुख़्तसरसी बात है…

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मुख़्तसरसी बात है,
तू जो सूनले तो मैं केह दु।

तेरी होठोंकी लालिसे,
और आँखोंकी गहराईपे,
ना कोई नझ्म लिख दु,
मुख़्तसरसी बात है…

चंद लम्होकी मुलाक़ाते,
बाकी बेचैन तनहाईकी
कोई गझल ना केह दु.
मुख़्तसरसी बात है…

तेरे आतेही बढ़ी धडकने
और सांस रुक गयी तो,
उसे रुबाई न बना दु,
मुख़्तसरसी बात है…

घुमाकर न अब करते हैं बात,
इश्क़का इजहार अब,
तू जो कहदे तो मै कर दू।
मुख़्तसरसी बात है,
तू जो सूनले तो मैं केह दु।


#LatePost Sorry guys, I missed the Monday post. Uploading this today.

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आस

Heavy Rain
By Pridatko Oleksandr (Ukraine) [Public domain], via Wikimedia Commons
लागली ग आज पहा, धार पाऊस संतत,
तुला जमेना यायला, हीच मनी आहे खंत.

जर नाही तू सोबत, काय कामी हा एकांत
तुझ्या विना सखे माझे, नाही होत मन शांत,

संध्या उलटून जाते, मी एकाकी गर्तेत,
कशी काढावी कळेना, विरहाची सारी रात.

सैरभैर जीव झाला, वाटे कैद मी घरात,
तुझ्या भेटीचीच आस, फक्त आहे या मनात…


Transcript to roman script

Lāgalī ga āja pahā, dhāra pā'ūsa santata,
tulā jamēnā yāyalā, hīca manī āhē khanta.

Jara nāhī tū sōbata, kāya kāmī hā ēkānta
tujhyā vinā sakhē mājhē, nāhī hōta mana śānta,

sandhyā ulaṭūna jātē, mī ēkākī gartēta,
kaśī kāḍhāvī kaḷēnā, virahācī sārī rāta.

Sairabhaira jīva jhālā, vāṭē kaida mī gharāta,
tujhyā bhēṭīcīca āsa, phakta āhē yā manāta...

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